Tuesday, September 15, 2020

बिलासपुर से सावित्री यादव "सावि" की रचना- बुनकर

विषय _ बुनकरों का व्यथा 
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
                बिलासपुर छ. ग.
 शीर्षक _बुनकरों का दर्द 

बुनकर धागे ऐसे बुनते है जैसे 
क़ोई माँ बच्चे के लिये सपने बुनती है |
एक एक धागे बड़े प्यार से 
धागे का सही परिश्रम  का मोल नहीं मिल पाता है |

मेहनत का सही फल  नहीं मिल पाता है |
धागे  का सही मोल नहीं मिल पाता है |
सूत कात कर कपड़े बनाना  ठीक वैसे जैसे 
चिड़ियाँ  अपना घोंसला  बनती है |

बुनकरों से उनका हुनर ऐसा छीन गया
जैसे जल बिना मछली होती है |
एक एक रेशे से वो धागे बना |
एक खूबसूरत कपड़ा  तैयार करते है |
ठीक वैसे जैसे  सारी मधुमक्खी  शहद  बनती है |

एक रोटी निवाले के लिये दिन भर मेहनत  करते है |
दुसरो का तन ढकने हेतु धागे बुनते जाते है |
मेहनत का फल नहीं मिल पाता है |
धागे का सही मोल नहीं मिल पाता है |

अपनी व्यथा कहे किससे  की मशीनों, 
के आने से रोजगार छीन गया |
 समर्पित होकर जो कार्य करते थे|
 वो कार्य  करने का मौका खो गया |
 मेहनत का फल नहीं मिल पाता है |
 धागे का सही मोल नहीं मिल पाता  है |

रंग बिरंगे कपड़े बनाते है|
पर रंग बिरंगे सपने नहीं देख पाते है |
रेशमी धागो मे लिपटा  उनके घर का पालन पोषण |
मशीन के आने से उड़ गए उनके चहरो को रौनक |
जैसे उड़ जाते है दीवारों से रंग |
मेहनत का फल नहीं मिल पाता है |
धागे का सही मोल नहीं मिल पाता है |


रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
               

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