विषय _ बुनकरों का व्यथा
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक _बुनकरों का दर्द
बुनकर धागे ऐसे बुनते है जैसे
क़ोई माँ बच्चे के लिये सपने बुनती है |
एक एक धागे बड़े प्यार से
धागे का सही परिश्रम का मोल नहीं मिल पाता है |
मेहनत का सही फल नहीं मिल पाता है |
धागे का सही मोल नहीं मिल पाता है |
सूत कात कर कपड़े बनाना ठीक वैसे जैसे
चिड़ियाँ अपना घोंसला बनती है |
बुनकरों से उनका हुनर ऐसा छीन गया
जैसे जल बिना मछली होती है |
एक एक रेशे से वो धागे बना |
एक खूबसूरत कपड़ा तैयार करते है |
ठीक वैसे जैसे सारी मधुमक्खी शहद बनती है |
एक रोटी निवाले के लिये दिन भर मेहनत करते है |
दुसरो का तन ढकने हेतु धागे बुनते जाते है |
मेहनत का फल नहीं मिल पाता है |
धागे का सही मोल नहीं मिल पाता है |
अपनी व्यथा कहे किससे की मशीनों,
के आने से रोजगार छीन गया |
समर्पित होकर जो कार्य करते थे|
वो कार्य करने का मौका खो गया |
मेहनत का फल नहीं मिल पाता है |
धागे का सही मोल नहीं मिल पाता है |
रंग बिरंगे कपड़े बनाते है|
पर रंग बिरंगे सपने नहीं देख पाते है |
रेशमी धागो मे लिपटा उनके घर का पालन पोषण |
मशीन के आने से उड़ गए उनके चहरो को रौनक |
जैसे उड़ जाते है दीवारों से रंग |
मेहनत का फल नहीं मिल पाता है |
धागे का सही मोल नहीं मिल पाता है |
रचनाकार _सावित्री यादव "सावि "
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