Friday, September 18, 2020

उर्मिला सिदार कृत निबंध- समाज सेवा

रचनाकार उर्मिला सिदार 
 ग्राम- बुलाँकी 
 जिला- रायगढ़( छत्तीसगढ़)
 विधा -निबंध लेखन
 विषय -समाज सेवा
 दिनांक18/09/2020
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         *समाज सेवा*

मानव इस संसार में 5 परिपेक्ष्य में जीता है।  स्वयं में ,परिवार में, समाज में ,राष्ट्र में , अंतरराष्ट्रीय में। दूसरे शब्दों में स्वयं में ,परिवार में, समाज में ,प्रकृति में।  इन्हीं परिपेक्ष में से एक परिपेक्ष  है  समाज । समाज   का तात्पर्य है- सम+  आज= समाधान+ वर्तमान =वर्तमान में समाधान पूर्वक जीने के लिए समाज। मानव का अखंड समूह अखंड समाज कहलाता है। समाज  खंड नहीं होता , अखंड होता है । वर्तमान में समाज को खंड कर समुदाय में समाज विभक्त हो गया है। समुदाय समाज झगड़ा का कारण बनता है। आज वर्तमान समाज का खंड -खंड में विभक्त का कारण अनेक मान्यताओं के कारण है। जैसे जाति, वर्ग ,धर्म, संप्रदाय ,भाषा, क्षेत्रीय भिन्नता, अन्य मान्यताओं के कारण वर्तमान समाज अमानवीय आचरण, कुरूतियों से भरा समस्याओं में पलता कुंठित जिंदगी झेलते हुए ,ह्रास कीओर  गति कर रहा है। आज तक मानव ने जो ज्ञान परंपरा से पाया है। उसका यही तक औकात है कि समाज में समस्या उत्पन्न करना   और दुःखी होकर जीना ।दुःखी होकर या समस्या मे कोई नहीं जीना चाहता।  अतः  समाज के लोगों को पुनर्विचार की समय की आवश्यकता है। वर्तमान समाज आस्था प्रलोभन में जकड़ा हुआ हुआ है।  इसी से मुक्ति पाने के लिए समाधान के लिए विकल्प की आवश्यकता है। समाज में समस्या का विकल्प समाज में समस्या का विकल्प की आवश्यकता है।  समाज में समस्या का विकल्प अनुसंधान कर लोगों को शिक्षा के माध्यम से आचरण अर्थात नियम अर्थात मूल्य की पहचान कराना और व्यवस्था में जीने के लिए बौद्धिक एवं भौतिक शक्तियों का सदुपयोग कर समाज के लिए सुनियोजित योजना तैयार कर क्रियान्वयन करना है समाज का मूल उद्देश्य है। किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रतिफल अपेक्षा  विहीन  मन ,तन, धन का सदुपयोग करना ही समाज सेवा  है।  सेवा में श्रम  प्रतिफल अपेक्षा  नहीं होती। सेवा में मन तन धन का प्रसन्नता पूर्वक समर्पण करना होता है यही समाज सेवा है। वर्तमान में समाज सेवा आस्था, भय, प्रलोभन से ग्रसित है जिसके कारण समाज अत्याचार और भ्रष्टाचार में डूबा समस्या से ग्रसित प्रदूषित समाज पनप रहा है। इसके  फलन मे हर मानव मे  में धुटन,  परिवार में टूटन,  समाज में विघटन, प्रकृति ने प्रदूषण, ऋतु में असंतुलन, वर्तमान परिदृश्य में दृष्टव्य हो रहे हैं। कहीं भी नजर उठाकर देखने से समस्या ही  समस्या चहुँ ओर दिखाई देता ह।  संसार में कहीं सुखचैन दिखाई नहीं देता है। सभी तरफ समस्या का बोलबाला है। फिर भी लोग भ्रमित होने के बावजूद होश में नही हैं। होश में आने की आवश्यकता वर्तमान समाज में महसूस की जा रही है। समाज में कुछ करने वाले, कुछ सोचने वाले, कुछ समझ कर जीने वाले लोग दिखाई पड़ते हैं। जो लोग समझ कर जीने वाले हैं, सोचने वाले हैं ।दूसरों के बारे में सोचते हैं ।अपने बारे में सोचते हैं। ऐसे लोगों की मानसिकता समाज के उत्थान के लिए कुछ करने के लिए मन बना रहता है।ऐसे लोग समाजसेवी बनकर समाज की सेवा के लिए अपना तन, मन, धन का सदुपयोग कर अपने जीवन को सार्थक बनाने में लगा देते हैं ।ऐसे सुविचार प्रवृति के लोग समाजसेवी कहलाते हैं। समाज में व्यवस्था का क्रियान्वयन कर समाज को व्यवस्था प्रदान करना अर्थात व्यवस्था को प्रमाणित करने में अन्य को प्रेरित कर प्रेरणा के स्रोत बनकर समाज में सहयोगी होकर प्रमाण क्षेत्र में कार्य कर अपने जीवन को कृतार्थ कर लेना होता है। समाज की व्यवस्था पांच आयाम में देखा जा सकता है ।पहला शिक्षा संस्कार, दूसरा स्वास्थ्य संयम, तीसरा उत्पादन कार्य ,चौथा विनिमय कोष ,पांचवा न्याय सुरक्षा उपरोक्त व्यवस्था में मन तन धन का निर्वाह करना है संसार की सर्वश्रेष्ठ समाज सेवा है। पाँच व्यवस्था में जीते हुए मनुष्य अपने लक्ष्य प्राप्त कर सुख समृद्धि विश्वास सम्मान के साथ जीते हुए अपने मानव पद में होने को प्रमाणित कर सकता है ।यही समाज सेवा है। इस व्यवस्था से मानव की समस्त समस्या का निवारण होकर, अभ्युदय प्राप्त कर सकता है ।यही व्यवस्था करो कि समाधान कहलाता ह।  व्यवस्था में जीते हुए मनुष्य भ्रम से मुक्ति होकर लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।मनुष्य जन्म का मूल अर्थ है भ्रम से मुक्ति होकर मोक्ष की प्राप्ति है। अतः हर मनुष्य सुबह से लेकर शाम तक, जन्म से लेकर मृत्यु तक, जो भी व्यवहार कार्य करता है, मोक्ष अर्थात सुख ,शांति के अर्थ में करता है लेकिन वर्तमान में इसकी उपलब्धि नहीं मिल पा रही है। अज्ञानता अभाव और आप सबकी अर्थात अत्यासा मानव को अपराध करने पर विवश,   कर रहा है। इसका निवारण समझने से ही हो सकता है। समझना अर्थात सह अस्तित्व को समझना होता है समझ बिना किसी का उद्धार होने वाला नहीं है। आता है ज्ञान का लोक व्यतिकरण होना लोग व्यतिकरण हेतु अपने भूमिका सुनिश्चित कर ज्ञान का पहचान करना है समाज की सेवा है। यही पुण्य का कार्य है । पुणयशील ही इस कार्य में मन तन धन का सदुपयोग कर पुण्य का भागीदार बनता है। वर्तमान में ऐसे ही लोग की आवश्यकता है। यही समाज की सुखद सेवा है उपरोक्त अब्बास व्यवस्था में भागीदारी करना ही सबसे बड़ी सेवा है आओ हम सब मानव जाति व्यवस्था में भागीदारी कर अपना मानव होने का प्रमाणित करें एवं गौरवान्वित होकर समाज की सेवा करें।

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