जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (उत्प्रेक्षा अलंकार पर आधारित )
शीर्षक --शिक्षा विकास की धूरी
व्याख्या ---कवि के वन्य प्रदेश के पिछड़े पन के कारण में शिक्षा का उचित विकास नहीं होना बताया गया है । अगर वहां भी शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो जाती है तो अन्य प्रदेशों की तरह उनका भी विकास संभव है ।
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शिक्षा विकास की धूरी
मानलो कोई रोगी है ,चिकित्सक बिन परेशान ।
वैसा ही मेरा वन्य प्रदेश, का हालत है सुजान ।
शिक्षा विकास की धूरी , उसके बिन सब अधूरी।
शिक्षा होगा सब कुछ होगा, सबको भी है ज्ञान ।
मानो शिक्षा की हो जाये व्यवस्था।
काया कल्प हो जाये ।
जो अव्यवस्था दिख रहा है ।
वह कहीं नजर न आये ।
जग में उनका भी अलग, बन सकता है पहचान ।
विकास की सीढ़ी सब चढ़ेंगे।
हाथों में उन्नति का द्वार होगा ।
नव संस्कृति की गंगा बहेगी ।
कल्पना सबका साकार होगा ।
मुंह ताकते जीवन में आ जाएगा जबान ।
मानो शिक्षा से स्वर्ग ।
उतारा जा सकता है ।
कितना समय लगेगा ।
विचारा जा सकता है ।
जानो इससे कल्याण और दीजिए इस पर ध्यान ।
हर आंसू मिट जायेंगे ।
हर होंठों पर मुस्कान लिखेगा ।
तन मन खुशहाल नजर आयेगी ।
नहीं कोई अपना भाग्य पिटेगा ।
शिक्षा की राह मुड़ना, जीवन के लिए वरदान ।
धन्य धन्य मेरा वन्य प्रदेश ।
धन्य यहां के लोग ।
बदलेगा जीवन शिक्षा और हाथों से ।
करना है तुम्हें प्रयोग ।
जीवन को बनाती शिक्षा, जग में सबसे महान ।
गिरधारी लाल चौहान
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