ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -कविता
शीर्षक- "वनांचल में शिक्षा "
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*वनांचल में शिक्षा*
वनांचल के लोग क्या, जाने शिक्षा का महत्त।
जैसे बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।
वनांचल वनों से ,आच्छादित
विलहड़ जंगल।
उनके लिए भौगोलिक वातावरण बनी है बाधक।
फिर भी मन में पढ़ने की, ललक
उठती है ,देख।
कौन उनकी वेदना समझे, मन कुंठित हो धराशाई है।
फिर भी आशातीत है, मन पढ़ने आगे बढ़ने के लिए।
जैसे प्यासी धरा ,आशातीत रहती है वर्षा के लिए।
वो हमसे परे नहीं है, वह भी साथ जीना चाहते हैं।
लेकिन हम क्या कर, पा रहे हैं उनको जगाने के लिए।
ज्ञान की रोशनी में ,सब जीना चाहते हैं जीवन में।
पर रोशनी फैलाने वाले ,कौन है दुनिया में।
फिर भी जारी है ,अल्प विकल्प की कोशिश।
लेकिन वे छोड़ना नहीं चाहते , अपने मातृभूमि।
धीरे से वनांचल में ,ज्ञान की ज्योति जलेगी।
जैसे आहिस्ता आहिस्ता सूरज चढ़ेगी।
कभी ना कभी आएगा ,वनांचल में बहारें है।
मानो खिल उठे हो ,बगियन में हजारें।
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व्याख्याः- इस कविता में वनांचल की दशा का वर्णन किया गया है।
इस कविता में कुछ पंक्तियों में उत्प्रेक्षा अलंकार व्यक्त हो रही है।
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उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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