Friday, August 7, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- अनंत सुख

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " अनंत सुख "
     विधा - छंदमुक्त कविता 
अलंकार - पुनरुक्तवदाभास अलंकार
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मोह माया को छोड़कर, 
हरि भक्ति का तू ध्यान कर। 
अनंत-अंतर प्रभु की लीला, 
उनका तू गुणगान कर।। 

जन्म मरण का यह खेला है। 
दुनिया कर्मों का मेला है।
विषय-मत संग्रहण में लिप्त सब, 
कामदेव के काम सब झमेला है।।

अनंत सुख तो हरि के चरणों में, 
तरंग-पतंग तारणहार है। 
सकल जगत का कल्याणकारी, 
जीवों का पालनहार है।। 

भौतिक सुख क्षणभंगुर है, 
नश्वर भी ये काया है। 
सुख-दुख का परदा हटाया जिसने, 
वही अंतिम सुख पाया है।।

जिसे कहता तू अपना-अपना,
मृत्युलोक तक ही तेरे साथ है। 
मन से अँधियारा मिटेगा तभी, 
जब आत्मदर्शन और परमात्मा का हाथ है।। 

मन तेरा भी बहुत ही चंचल, 
दृष्टहीन बन क्यों चलता है। 
कस्तूरी की खोज में जैसे हिरण, 
बाहर-बाहर ही भटकता है।।

मन का आईना खोल कभी, 
बदल तू अपना दृष्टिकोण। 
सुख-दुख की सीमा लाँघ ले, 
अंतिम सुख का आगे है मोड़।। 

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 पुनरुक्तवदाभास अलंकार का प्रयोग :-
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1. अनंत-अंतर = आकाश
प्रयोग :- आकाश, विष्णु। 

2. विषय-मत = संपत्ति 
प्रयोग :- संपत्ति, भोगविलास। 

3. तरंग-पतंग = नौका
प्रयोग :- नौका, पक्षी।

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