रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-छंद मुक्त कविता
विषय-सुख-दुख से भिन्न अनन्त सुख
अलंकार- पुनरुक्तवदाभास अलंकार
शीर्षक- अनन्त सुख
सुख-दुख से भिन्न अनन्त सुख
माता-पिता की सेवा बिन कहाँ
इस जग जग रूपी मंदिर है वहाँ
माता -पिता का सम्मान हो जहाँ
जहां में निज स्वार्थ ही सर्वोपरि है
निस्वार्थ प्रेम चरणों मे है वहाँ
अनन्त सुख हृदय में प्रभु के वास में है
छोटे बच्चे के दंतुरित मुस्कान में है
माता-पिता और बड़ों के आशीर्वाद में है
भूखे के लिए अन्न के दाने-दाने में है
भंवर में फंसे मुसाफिर के लिए
तट के दीदार में अनन्त सुख है
कवि के लिए नई -नई विषय के
ज्ञान और पहचान में अनन्त सुख है
चरण-चरण पादुका से मिले
प्रभु के चरणों मे है अनन्त सुख
मधु मधुमय जीवन है वहाँ
प्रिय-प्रिय से मिला हो जहाँ
सुख-दुख से परे है जीवन यहाँ
अपने-अपनो के साथ हो जहाँ।
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