Monday, August 24, 2020

महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- नटखट नटवर

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- आध्यात्मिक क्षेत्र
शीर्षक :- नटखट नटवर 
अलंकार :- प्रतीप अलंकार

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श्यामल काया फिर भी जग को,
कान्हा बहुत सुहाता है।
देख कृष्ण की मुख की आभा,
सूरज भी शरमाता है।
सिंप से सुंदर कजरारे नयन,
आया उसमें काजल लगाकर।
सींक तोड़ माखन चुराता,
जग के प्यारे नटखट नटवर।

माटी खाते बन नादान,
बृहद मुख से लज्जित ब्रम्हाण्ड।
यशोदा का मन अकुलाया,
निज मुख में सकल ब्रम्हाण्ड दिखाया।
मटकी फोड़े जो गोपियों के,
राहों में अक्सर छुप छुपकर ।
फिर सिरे से खारिज करता,
जगत प्रिय नटखट नटवर।

चंचलता इतनी भरी की,
चंचल भौंरा कुछ भी नहीं।
मित्रता सागर से गहरा,
ऐसी जो कभी देखी नहीं।
जिनके भूखे रहने पर सोते,
कान्हा भी भूखे अक्सर।
धमा चौकड़ी संग में करते,
चित चोर नटखट नटवर।

प्रीत भाव बहुमूल्य हुआ की,
दूरी में भी प्यार भरा।
द्वेश भाव से उजड़ा उपवन,
लगता अब है हरा भरा।
कठिन डगर पर प्रेम की,
दिखलाया है जग को चलकर।
प्रगाढ़ता उर में भरे हैं,
प्रीतम नटखट नटवर।


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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने श्री कृष्ण जी की आराधना करते हुए अपने भावों को शब्दबद्ध किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने प्रतीप अलंकार का प्रयोग किया है।

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