Monday, August 24, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- आत्मा

रचनाकार -उर्मिला सिदार
 ग्राम -बुलाँकी
जिला-  रायगढ़ (छत्तीसगढ)
विधा -कविता
शीर्षक-"आत्मा"
 
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            *आत्मा*

 जीवन से बड़ा शरीर ,
जो माने वे भ्रमित ,
श्रेष्ठ जो ना पहचाने ,
जाता है ह्रास की गति।

विश्वास में भ्रम श्रेष्ठ ,
बाकी सब मुझसे नेष्ट,
ऐसे अहंकारी विश्वास तोड़े,
 मानवीता से नाता जोड़े।

 आत्मा से मन बड़ा,
 मन से करें मनमानी ,
ज्ञान से भौतिकता बड़ा ,
 ऐसा माने अज्ञानी।

 जो सकारात्मक से बड़ा मान,
  नकारात्मक से जीए,
 पाये हर पल दुःख ,
 भौतिकता को माने सुख।

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 व्याख्या:- इस कविता में आत्मा को नेष्ट और शरीर अर्थात भौतिक वस्तु को श्रेष्ठा मानने वाले व्यक्ति मान्यता में जीते हैं अर्थात समस्या में जीते हैं।

 प्रतीप अलंकार 
 जीवन से बड़ा शरीर
 विश्वास से बड़ा भ्रम
 आत्मा से बड़ा मन

 उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

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