खैरागढ़ जिला राजनांदगांव
विधा,, छंद मुक्त कविता
शीर्षक,,, *अधूरी ख्वाहिश*
मन ज्वार - भाटा का तरंग,
आकांक्षाओं के उठते हैं लहर।
कुछ रह जाते अधूरे,कुछ पूरे,
उमढ़ते स्पंदित विचार अधर पर ।
दम तोड़ देती है जिंदगी पूरी,
रह जाती है ख्वाहिशें अधूरी ।
हिलोर लेते हैं मन में,
कुछ कर गुजरने की तरंगे।
पर जहां में पग-पग स्वार्थ है,
कम कर देते हैं मन की उमंगे।
दूसरों का मान रखते - रखते,
अधूरी रह जाती है अपनी ख्वाहिशें।
बढ़ते कदम रोकना लोगों की फितरत है,
कदम रोकने से पहले उनको परख लें।
छल कपट की निरवार कर,
अपने अरमान पूरा कर ले।
जहां में दम तोड़ने से पहले ,
अधूरी रहने न दे अपनी ख्वाहिशें।
श्रीमती पदमा साहू खैरागढ़
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