उर्मिला सिदार
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -कविता
शीर्षक -"अनंत सुख "
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"अनंत सुख"
सुख दु:ख भिन्न अनंत सुख,
लिखती हूँ स्वच्छंद लेख।
अनंत आनंद हो मैं,
लिखूं कुछ कविता सुलेख।
अनंत अनंत की महिमा,
कोहु जाने न कोय।
जो अनंत की महिमा जाने,
आनंद विभोर मन होय।
उरू उरू मन धरियो,
उर्मि उर्मि गति न करियो।
अनंतअनुभूति आनंद मिलियो,
अनुस्यूत आहिस्ता सुपथ चलियो।
अली अली ज्यों फड़फड़वत,
मधु रस लियो जाई ।
त्यों प्यासी मन व्यकुलानी,
ज्ञान ढ़ुढ़न जग आई।
ज्ञान आलोक जीवन चलियो, मिल ही सुख अनंत।
अनंत सुख जीवन लक्ष्य,
मिलहुँ सुमन अरू संत।
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व्याख्या:- इस कविता में कवित्री अनंत सुख की प्राप्ति कैसे हो पाएगी इसी की व्याख्या की
है।
पुनरुक्तवदाभास अलंकार
अनंत-विष्णुजी, असीम
उरू-नाम,श्रेष्ठ
उर्मि-पीड़ा,लहर
अली-सखी,भौरे
उर्मिला सिदार
रायगढ़ छत्तीसगढ़
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