स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"भगवान विष्णु"(पुनरुक्तादोभाष अलंकार)
विधा- छंदमुक्त कविता
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अनंत-अनंत हो आप प्रभु
कोई नहीं समकक्ष तुम्हारे ।
सुख- दुख से परे हो
सब आते चरण तुम्हारे ।
अनंत के छत्रछाया में
छीर सागर में समाते ।
सब का ज्ञान-अज्ञान हैं बनते
और मन्द- मन्द मुसकाते ।
जो जान-जान जाता सब
मन- मनका पाता तब ।
वो आमोद-प्रमोद से उबर
आत्मा- आत्मिक सुख पाते ।
सरल अडिग चल निरंतर
भव-भवसागर से तर जाते।
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पुनरुक्तादोभाष अलंकार- अनंत-अनंत (जिसका अंत न हो,विष्णु, शेषनाग)
मन-मनका(हृदय, भक्ति रूपी मोती)
जान-जान(जीवन,जानना)
आत्मा-आत्मिक(आत्मा, आत्मा को तृप्त करने वाला सुख)
आमोद-प्रमोद(सांसारिक खुशियों )
भव-भवसागर( संसार,भवसागर)
very nice .... 👍👍
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