जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- लक्ष्य
अलंकार :- विभावना अलंकार
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साध लिया लक्ष्य जीवन का,
पर बिनु मेहनत चाहूं पाना।
किए बिना किसानी जग में,
चाहूं मिले "जोगी" अन्न दाना।
बिना पढ़े है मन की इच्छा,
शत् प्रतिशत मिले मुझे अंक।
बिना किए कर से कोई काज,
बनु नरेश ना रहूं मैं रंक।
बिनु पंख है लक्ष्य मेरा,
उड़ कर छू लूँ आसमान।
बिन सीखे जग में कला कोई,
बन जाए मेरी पहचान।
यहीं मेरी कमजोरी जग में,
पके हरदम खयाली पुलाव।
चलता पाने लक्ष्य ज्यों ही मैं,
आ जाते राह में भटकाव।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने अपने मन के बारे में बताया है जो कि वास्तव में हर मनुष्य का लक्ष्य होता है। बिना कोई मेहनत किए अच्छा फल मिलना।
रचनाकार ने विभावना अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
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