स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"बिन बसंत बहार"
विधा- कविता(विभावना अलंकार का प्रयोग)
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बिन बदन आलिंगन जब
बिन मन मचल गया तब
अंग -अंग सम्हल नहीं रहा
ये धड़कन धड़क नहीं रहा
बिन मेघ बरसे है बादल
बिन हवा लहरे है आँचल
बूंदों के भिगाये न भिगे तन
जम के नाचूँ बरखा के संग
बिन कोई बहके ये मन
बिन पंख उड़ने लगे तन
मस्त मन मतवाला हुआ
जब नहीं है कोई संग
बिन ख़्वाब सुन्दर लगे
मिलन को हृदय तरसे
बिन कुछ हो कर भी
जाने क्यूँ लक्ष्य से भटके
बिन मकरन्द झूमें मधुप
बिन कलियन खिले पुष्प
बिन बसन्त बहार छाया
पुष्पा हो गयी है कुरूप
( व्याख्या-:रचनाकार बसंत में सूंदर हो प्रियतम संग मिलन का लक्ष्य रखती है पर सारे बसंती कार्य होते हुए भी लक्ष्य हासिल नहीं हो पाता)
Heart Touching
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