स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---छंद मुक्त कविता(ध्वन्यालंकार पर आधारित)
शीर्षक ---नहीं चाहिए युद्ध मुझे
व्याख्या ---कवि के द्वारा युद्ध से सम्पूर्ण विनाश समाज को प्राप्त होता है जिसमें जन धन सभ्यता विचारों का भी विनास होता है इसलिए कवि के द्वारा युद्ध का तिरस्कार एवं विचारों का शांति पूर्वक युद्ध करने पर बल दिया गया है।
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नहीं चाहिए युद्ध मुझे
नहीं चाहिए युद्ध मुझे, , नहीं चाहिए लोगों का विनास ।
मैं शांति में विश्वास करता हूं,यही अस्त्र है मेरे पास ।
अनेकों युद्ध धरा ने देखा,क्या मिला है लोगों को ।
मैं पुनः नहीं चाहता जीवन में, हुए उन प्रयोगों को ।
जो युद्ध का स्वप्न देख रहे,भूलें उनसे मेरा दरख्वास ।
राम रावण में युद्ध हुआ,नर, वानर, रीछ, निशांचर लड़े ।
गरजे तलवार ,धनुष बाण ,गदा, चतरंगनी सेना थे सजे ।
बह चले रक्त की नदियां, डूब चले चहुं ओर लाश ही लाश ।
महाभारत का युद्ध प्रसिद्ध,पूरे लड़े भारत वर्ष महान ने ।
कौरव पाण्डवों का था युद्ध, जिसे लड़े पूरे जहान ने ।
कलिंग का युद्ध गौर से सुनिए,जिसे देखा है आकाश ।
आधुनिक युग में युद्ध हो रहे, मिशाइल तोप बम गोलों से ।
प्रकृति को ही नष्ट कर रहे , अपने स्वार्थ के इन ढ़ोलों से ।
नहीं कुछ बच जायेगा समूल, देख लेना इनके पास ।
मैं विचारों का युद्ध लड़ूंगा, दुर्गुण सारे मिटाऊंगा ।
सत्य ,धर्म, न्याय, परहित,दया , क्षमा , अहिंसा वालों का सेना बनाऊंगा ।
खुद करुंगा संचालन तन मन धन जीवन से , है इसका मुझे प्यास ।
गिरधारी लाल चौहान
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