Saturday, August 8, 2020

कांकेर से मीरा आर्ची चौहान की रचना- जीवन की दोपहर

रचनाकार-मीरा आर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-जीवन का दोपहर
विधा-कविता ( मुक्त छंद)
अलंकार-काकु-वक्रोक्ति अलंकार

लौट जाती हूं मैं बार-बार
उस बचपन को पाने को।
प्यारे बापू , भोली अम्मा 
घूमते मुझे  ही मनाने को।

सुबह का सूरज दे गया,
जीवन मंत्र बढ़ जाने को।
राह चलो पर तुम डरो नहीं,
जीवन का दोपहर आने दो।

तपती धूप ,रेत की फिसलन
जीवन का राज बता जाते।
कितने कांटे चुभे राह पर,
पैर के छाले दिखला जाते।

उछल -उछल जो देखे थे ख्वाब,
हकीकत में सिर्फ बदलने को,
जीवन की दोपहरी समझा गई ,
दीपक बन रोशनी फैलाने को।

मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
_________________________
*काकु वक्रोक्ति अलंकार-*
तपती धूप-संघर्ष,
रेत की फिसलन-छूटना
पैर के छाले-दुख
जीवन का राज-रहस्य
रोशनी फैलाना-सद् कार्य
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