जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय-जीवन की दोपहर
विधा- वक्रोक्ति श्लेष अलंकार
शीर्षक- *प्रेम प्रसंग*
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निकले थे सफर में
मंजिल की तलाश थी,
रुकावटों का खेल ऐसा
भूख थी न प्यास थी ।
रुके चौराहों पर तो
हर दरवाजा बंद मिला,
कह दो मेरी न खबर थी
न आहट न अहसास थी ।।
ठोकरें ही मिलीं
दरवाजे की ठोकर सी,
पर तुम्हारा बेअदबी से
मुंह फेरना खास थी ।
जिल्लत भरी जिंदगी मेरे पास थी,
मैं भिखारी न सही
पर छुट्टे चिल्हर सी
तुम्हारी उपहास थी ।।
मैं हूं कोई कीट पतंगा
क्या मेरा आवास,
प्रवास तुम्हारा ही
हुआ देख मेरा उल्लास ।
रोने को रूमाल नहीं
तो ला वही कपास दे,
तिनका तिनका ना जोड़
दिल का वही कारावास दे ।।
व्याख्या-
यहां नायक नायिका के प्रेम प्रसंग का वर्णन है, जिसमें नायिका के न होने का एहसास नायक को ग्लानि से भरा हुआ क्षुब्ध कर रहा है और वह स्वयं से ही बातें कर रहा है ।
जैसे-प्रथम पद में मंजिल की तलाश के लिए समर्पण चाहिए, परंतु मंजिल को छोड़ रुकावटों में ही उसका समर्पण दिख रहा है।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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