जिला- कांकेर,छग
शीर्षक- गुमराह
विधा-कविता (मुक्त छंद)
समय अति बलवान मानव,
मन को यूं मत गुमराह कर।
मनका मन का कर लें मानव,
कल की अब परवाह न कर।
बाली बाली बेचा बिटिया का,
करोना आहत गुमराह न कर।
जंगल जंगल का जीवन हो गया,
मन में यूं ही अब आह न भर।
छंट जायेंगे दुःख के ये भी बादल,
रख हौसला मन गुमराह न कर।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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