Tuesday, August 4, 2020

कांकेर से मीरा आर्ची चौहान की रचना- गुमराह

रचनाकार-मीरा आर्ची चौहान
जिला- कांकेर,छग
शीर्षक- गुमराह
विधा-कविता (मुक्त छंद)

समय अति बलवान मानव,
मन को यूं मत गुमराह कर।

 मनका मन का कर लें मानव,
कल की अब परवाह न कर।

बाली बाली बेचा बिटिया का,
करोना आहत गुमराह न कर।

जंगल जंगल का जीवन हो गया,
मन में यूं ही अब आह न भर।

छंट जायेंगे दुःख के ये भी बादल,
रख हौसला मन गुमराह न कर।।

मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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