रचनाकार -सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
विषय _ गुमराह
शीर्षक _ गुमराह
गुमराह होता हर इंसान अपनी ही इछाओ के कारण
और ना इच्छा पूरी होती है और ना होता उसका निदान
आपस में उलझा रखता है| हर बात को ख्वाब को |
और सोना भी चाहिए |और सोना भी चाहिए |
पर मिलता नहीं चैन मन को |
क्यों भटकाता है | पागल मन को |
ये बहकता भी है बहकता भी है | इंसान को |
प्यासा मन है | प्यासी आस है|फिर भी है विश्वास |
कभी तो पूरी होंगी मन की हर इच्छा जो है खास |
ना खुद को समझाता है | ना खुद को बहलाता है |
ये चंचल मन है | खुद को गुमराह करता है |
गुम हो जाता है | राह में और मंजिल पाना चाहता है |
ये मन ही है | जो मन भर पूरी कायनात में घुम आता है |
भावर्थ _ मन के भटकाव का वर्णन
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