जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
प्रदत्त विषय :- गुमराह
अलंकार :- यमक अलंकार
शीर्षक :- जग हरदम करता गुमराह।
**********************************
**********************************
मत सुन मनवा बात किसी की,
जग हरदम करता गुमराह।
मन में निज के रख विश्वास,
आप ही प्रशस्त होते हैं राह।
निज कर से कर सब काज,
ना सोंच यहां कोई हमराज।
सद कर्मों से अपने तू,
चढ़ शिखर पर विराज।
अमृत धारा बहती नदिया,
अमृत सी लगती है।
पर अक्सर मतभ्रष्ट हो तब,
विष बन मन को छलती है।
कुछ मानव देते उपदेश कपिल से,
कुछ लोग कपिल से भौंकते हैं।
हरदम बढ़ते पांव खींचने,
जग में सब यहीं सोचते हैं।
खग को छूने की काबिलियत,
नन्हा खग भी रख सकता है।
पर सुनकर इस जग की बात,
वह गुमराह भी हो सकता है।
बहुत मिलेंगे जग में तुझको,
मतभ्रष्ट करने वाले।
पर सुन विरले ही मिलेंगे,
मन में नव ऊर्जा भरने वाले।
********************************
********************************
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जग में मिलने वाले गुमराह करने वाले लोगों के बारे में जिक्र करते हुए कहा है कि जग में बहुत से ऐसे लोगों मिलेंगे जो तुम्हें मतभ्रष्ट करने वाले होंगे।
काव्य को अलंकृत करने के लिए कुछ शब्दों का प्रयोग एक से अधिक बार किया है जहां हर बार अर्थ भिन्न-भिन्न हैं। जैसे
कर - हाथ
कर - करना
अमृत - पानी
अमृत - सोम
कपिल - मुनि
कपिल - स्वान / कुत्ता
खग - सूर्य
खग - चिड़िया।
No comments:
Post a Comment