रचनाकार श्रीमती रजनी शर्मा
जिला। रायपुर
शीर्षक। यादों के जंगल
विधा मुक्त छंद
यादों के जंगल
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बदली सी है विरही आंखों की
रंगत अब तो,
रक्ताभ डोरे धीरे धीरे से खुलने
लगे हैं ।
शब्दों ने भी बदल लिया अब तो
स्वाद अपना,
नमीं की नमक वो भी अब पीने
लगे हैं।
मौसमों को भी चढ़ा ताप बन गये
हैं बहुरूपिया,
धूप छांव सस्ते में जिंदगी की घर
में बांटनें लगे हैं।
सुक्खम दुक्खम की चुगली करते
करते ,
गालों के अनार भी अब दहकने
लगे हैं।
ख्वाहिशों के मेले भरे ही कब थे?
उजाड़ने वाले भी फेरी लगाने
लगे हैं।
संवादहीन संप्रेषण ही कर लेना
अब तो,
संवदिया भी अब झूठे से लगने
लगे हैं।
यादों के जंगलों में बारिशें जो हुई,
रजनी के दामन में जुगनु चमकने
लगे हैं ।
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