जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- पुनरुक्तवदाभास अलंकार
विषय-सुख दुख से भिन्न अनंत सुख
शीर्षक- जीवन
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जीवन है इक दरिया डूब के जाना और पार लगाना है,
काल काल में आएगा, फिर भी हर पल मुस्कुराना है ।
माया मोह का यह बंधन बंधन में ही रहना है,
सारे गमों का का बोझ अपने कंधों पर ही रखना है ।।
कब तक मौन रहोगे केशव, क्या तुमको भी शस्त्र उठाना है,
कुरुक्षेत्र के मध्य चलो गीता का ज्ञान भी तुम्हें सिखाना है ।
दुशासन सैरंध्री का चीर चीर रहा है,
परे होकर रिश्तों से तुम्हें रिश्तों का फर्ज निभाना है ।।
जीवन है एक अबूझ पहेली सब का आना-जाना है,
विनती सुनो हे हर हर एक को क्यों हमें अपनाना है?
हॅंसने रोने का कैसा संगम है यह जीवन,
पथरीली है सड़क फिर भी सरपट दौड़े जाना है ।।
नश्वर है यह घट घट रहा नित निरंतर,
एक अदृश्य प्रतिबिंब कृष्ण कृष्ण को बस लीला ही दिखाना है ।
बस बुद्धि विवेक हो जड़ जड़ फिर कब तक वृक्ष थामेगा?
मानव से मानव कब उठेगा और जागेगा?
इसलिए जागो हे अनुयायी छोड़ो दर्शन दर्शन ही स्वयं कर्म है,
मृत्यु ही एक अनंत सत्य,कर्म को ही धर्म का ज्ञान कराना है ।।
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पुनरुक्तवदाभास अलंकार हेतु प्रयुक्त शब्द-
काल- मृत्यु, समय
बंधन-बंधना,कैद
चीर- वस्त्र,चीरना
हर- शिव जी,प्रत्येक
घट- शरीर,घटना
कृष्ण-काला ,भगवान श्रीकृष्ण
जड़- अचेतन,मूल
दर्शन-स्वप्न,एक शास्त्र
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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