Friday, August 7, 2020

बलिया,उत्तरप्रदेश से कवि अमलदार नीहार जी की कविता- सिसकते-सुलगते-दहकते दौर का दस्तावेज

अमलदार नीहार
हिन्दी विभाग
श्री मुरली मनोहर टाउन पीजी काॅलेज, बलिया


सिसकते-सुलगते-दहकते दौर का दस्तावेज़

नीहार के दोहे


"गो कोरोना गो" बको, करो चलीसा-पाठ।
लीप लपन गोबर कहो--"दिल्ली छक्के साठ"।।



जनता बिके चुनाव में, फिर-फिर बेची जाय।
बिके विधायक लोभ-वश, बस जनता पछताय।।




अपराधी को जो चुने मार कुल्हाड़ी पाँव।
समझो इसको खुदकुशी, जीवन भर  का घाव।।




पारमिता प्रज्ञा धृता, धन्यवाद भोपाल।
गाँधी-हंता गोडसे, शामिल हुए कमाल।।



लोकतंत्र के गात से निकल गये तब प्रान।
प्रत्याशी आशी बने, समझो सिली जुबान।।




चरन-आचरन और कुछ धार यती के भेस।
राजनीति साध्वी सती, समझो भेद भदेस।।

राजनीति की गोद में लक्षित कैसे राम।
पिये पूतना-प्राण-पय कान्हा ज्यों घनश्याम।।



हृदय-अयोध्या में लसे रावणारि जो राम।
राजनीति-मारीच-मुख बसे, भीम परिणाम।।



काशी-मथुरा बोल बम, राधे-राधे बोल।
होगा ऐसा जागरण, कल के पन्ने खोल।।



शबरी को रोटी नहीं, कबरी ली है काट।
आश्वासन हलवा सुभग भर-भर दोने चाट।।




रोजगार की पूछ मत बेबस तू बदहाल।
अभिनव पीढी का हुआ जीना बडा मुहाल।।



चूल्हा बुझा रहीम-घर चिन्तित रामसुमेर।
रमई का जब घर जला, ले रहमत को टेर।।



आगे-आगे देखिए विकसित विष के बीज।
रक्तबीज के बीज भी अजब-गज़ब की चीज।।



बँधा बवण्डर पाँव में, अब हो चुका विकास।
बहुत पुराने हो गये नारे सब खल्लास।।



जब-जब जिसने जो कहा, बदली उलटी चाल।
कहो कबूतर बाज को, बगुले हुए मराल।।




मंगल ग्रह तो लक्ष्य था,किन्तु अमंगल सोच।
खेला शुरू विनाश का, चंदा अब उत्कोच।।



शरणागत-वत्सल सदा हे प्रभु दीनदयाल।
वनवासी तुम थे भले, रक्खा खिन्न-खयाल।।



अब तो राजा राम का मीत बना है बालि।
राजनीति यह आधुनिक मित्र बने बलशालि।।



पंछी गाये या हँसे, उठी कलेजे हूक।
बस्ता दुःख-पहाड़ सा, काँप रहा शम्बूक।।



बाढ़ झोपडी ले गयी, मौत सहेली भूख।
बप्पा-हाथ कपार पर, आँगन-बिरवा सूख।।



उसकी छूटी नौकरी, इसका छूटा काम।
राम नाम को याद कर फाका है, आराम।।



किसकी अस्मत कब लुटे, कत्ल कहाँ किस राह।
राजनीति के रहनुमा बन्दों की जो चाह।।




सपने सारे बह गये आँसू के सैलाब।
दहशत में बस्ती बहुत सुनकर लिंचिंग माॅब।।



कटे पेड़ सी ढह गयी अम्मा बैठक-ठौर।
बेटा हुआ शहीद है, नाव बुढापा भौंर।।




कलुआ निकला काम को कच्ची उमर अधेड़।
सुना कि गोली लग गयी, वर्दी से मुठभेड़।।



क्या है मर्जी राम जी! दिल के शाहंशाह।।
सुन अनाथ-रव नीति की मार कटार कराह।।





'जन' को रोटी चाहिए, कुछ को बोटी-स्वाद।
किसको जीने की ललक, पूछे है सैयाद।।




दिल्ली तो बेचैन है, तुझसे जोडे़ नैन।
उजडे़ जिनके दिल यहाँ, कैसे बीते रैन।।



दंगा-पंगा तू कहाँ जाने भोले राम!
राख आँख में आ चुभे,बिखरे लहू प्रकाम।।




उजड़ा गुलशन बन गया प्यारा भारत देश।
अनगिन रावण हैं यहाँ भाँति-भाँति के वेश।।



पदाक्रान्त इस देश से कौन करेगा प्यार।
पग-पग काँटे-बेबसी लख रोये 'नीहार'।।




नयी-नवेली नीति को कुछ पल निरख निहार।
क्या होगा कल, सोच ले, मिले निवाले चार।।



जौंकिलधर्मी हाथ में सम्भावित अधिकार।
घुटनों के बल बोल तू--"सर!हुजूर!सरकार"।।



चमड़ी उधडे़गी यहाँ, दमडीलाल दलाल।
काल-कलंकुर जिन्दगी, किसकी सोची चाल।।


दिल से दिल के बीच तू बाँध समुंदर-सेतु।
सबका दर्द उधार ले राघव रघुकुल-केतु।।
रचनाकाल : 5 अगस्त, 2020
बलिया, उत्तर प्रदेश
[नीहार-दोहा-महासागर : द्वितीय अर्णव(तृतीय हिल्लोल)अमलदार नीहार]

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