लीलाधर कुम्हार
विषय:- जीवन का दोपहर
विषय क्षेत्र:- मुक्त
विधा:- छन्द मुक्त कविता
अलंकार:- श्लेष वक्रोक्ति अलंकार
शीर्षक :- जीवन का दोपहर
सुबह का बचपन बीत गया ,
खेल - कूद नादानी मे ।
जीवन का दोपहर आ गया ,
यौवन की मस्तानी मे।।
जोश उमंग अपार है ,
हृदय प्रेम-रस धार।
कुछ करने-बनने की इच्छा,
इच्छा अपरम्पार ।।
गरम खून चंचल मति ,
विषय-वासना के फंदे ।
सफल उन्ही का जीवन जो,
संयम-सत्संग में सधे।।
ग्रीष्मकालीन दोपहरी ,
दोपहर का जीवन ।
भूख प्यास गर्मी बढ़े ,
ये तीनों तन - मन ।।
शाम का बुढ़ापा आये ,
उसके पहले चेत करो ।
देश-धर्म की लाज बचाने ,
प्रखर जवानी भेंट करो ।।
भारत माँ की सेवा मे ,
सार्थक कर लो जिंदगी ।
मानव-जन्म सफल हो जाये,
कर लो ऐसी बन्दगी ।।
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रचनाकार
लीलाधर कुम्हार
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