स्थान-दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्तक,अनन्वय अलंकार का प्रयोग
शीर्षक-
*भारत जैसा भारत*
स्वतंत्रता दिवस का उत्सव,देश की आजादी का पर्व,
लेकिन यह आजादी अभी अधूरी है।
विदेशी निर्भरता,विदेशी कम्पनियों की लूट अभी जारी है,
भाषा विदेशी, भोजन विदेशी,सामान विदेशी फिर स्वदेशी क्या रहा ?
शास्त्री जी,मोरारजी जैसे देशभक्तों ने स्वदेशी नीति अपनाया था, और
विदेशी कम्पनियों को भारत से दूर भगाया था ।
फिर क्यों व्यापार व्यवस्था मे अवमूल्यन हुआ हमारी पूंजी का ?
यही परतंत्रता दूर करने स्वदेशी अब अपनाना है।
देश के हर त्यौहार में मिट्टी के दीये जलाना है,
अपने देश के कुम्हार(कारीगर) को सम्मान अब दिलाना है।
स्वदेशी जैसा स्वदेशी भोजन,हो स्वदेशी पहनावा,
सामान लेंगे अपने देश का,हिन्दी बोलने में क्यों शरमाना ?
व्यवस्था हो स्वदेशी, तंत्र स्वदेशी,गद्दारों को दूर भगाना है,
डिजिटल आजादी भी जरुरी, एप भी स्वदेशी अपनाना है।
स्वावलंबी भारत जैसा भारत हो,दोबारा कभी ना गुलाम हो,
फिर अपने भारत को सोने की चिड़िया बनाना है ।
फिर पूरे संसार में भारत का परचम फहराना है,
विश्वगुरु भारत को विश्वगुरु भारत जैसा बनाना है ।।
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