०२. जिला/राज्य :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
०३. शीर्षक :- *पाती*
०४. विधा :- मुक्तक (रूपकातिशयोक्ति अलंकार)
------------------------
*पाती*
तरसी आँखों ने भिजवाई
पाती इंद्र के गेह ,
रूखी सूखी धरा हो गई
भेजो कुछ तो मेह ।
भेजो कुछ तो मेह ,
दया हम पर दिखलाओ ।
करुणा की बूंदें तनिक ,
हम पर बरसाओ ।
नहीं पसीजी इस पर भी
आसमान की छाती ।
शून्य हुए अनुरोध ,
वृथा हुई अनुनय पाती ।
उस पाती को पतंग बनाया ,
ऊँची छोड़ी डोर ।
अंबर के बागीचे में
उलझी जाकर छोर ।
उलझी जाकर छोर ,
तोड़ लिए बादल सारे ।
फूट फूट कर रोई बरखा
भय के मारे ।
"भय बिनु होए ना प्रीति" ,
कह गए संत गोसांई ।
पाती के उत्तर में छमछम,
बरखा आई ।
------------------------------
भय बिनु होय ना प्रीत...!!! बहुत ही सुन्दर कविता... पढ़ने पर ऐसा प्रतीत होता है अक्षर लय में गा रहे हों...!!! बहुत बहुत बधाई एवं साधुवाद
ReplyDelete