निवास-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक-पर्यावरण व मानव ।
विधा-कविता ।
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☆☆●||पर्यावरण व मानव ||●☆
तपती धरनी,रोगी के,ज्वर समाना,
सूखी नदिया,बिरहा के दर्द समान।
लिपटी लता पेड़ों में,भुजंग समाना,
धरती में फैली हरियाली,बिछौने समाना ।
बाढ़ों का सैलाब,हुआ जमीनों में कटाव ,
पेड़ों की अँधा-धुन्ध कटाई,हुआ जनधन में घटाव ।
पर्यावरण-प्रदूषण है,जहर समाना,
टी.बी. ,ह्रदयरोग,चर्म रोग,कहर ढहना।
अम्लीय वर्षा,अति वर्षा,धुंध-धुंआ,
करे मानव-जीवन व प्रकृति पर दानवता सा विनाश ।
जैव-विविधता,औद्योगिकरण का सैलाब,
जीव-जन्तुओं की आनुवांशिकता व पर्यावरण-सन्तुलन को,करे खराब ।
धरा में,पर्यावरण-सन्तुलन बना रहेगा,
तभी मानव,थलचर जलचर उभयचर बचा रहेगा ।
मानव के मानवीकरण में है इसका योगदान,
जल,जंगल और जमीन,जीव-,जन्तुओं
के लिए बना वरदान ।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जाति के जीवन में पर्यावरण की प्रासंगिकता का मतलब बताने की कोशिश की है ।
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