जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विधा - छंदमुक्त कविता
अलंकार - अपह्नुति अलंकार
विषय - सेवा या श्रम आधारित
शीर्षक - श्रम और सेवा
एक राजा के राज्य में ,
पावन गंगा के किनारे ।
भव्य मंदिर बन रहा था ,
तभी एक दिन राजा पधारे ।।
सैकड़ों कारीगर मजदूर ,
कार्य कर रहे थे तत्पर ।
छद्म वेष में राजा पूछे ,
क्यों कैसा है कार्य यहाँ पर ??
बोला एक मजदूर झुंझलाकर ,
गर्मी प्यास सहन करते हैं ।
छैनी हथौड़ा लेकर हम तो ,
पत्थर तोड़ पेट भरते हैं ।।
दूसरा बोला अच्छा है जी ,
रोजी - रोटी मस्त चल रहा ।
अपने को रोजगार मिल गया ,
आमदनी से चिन्ता टल गया ।।
तत्पश्चात राजा जी ने ,
पगड़ी वाले भाई से पूछा ।
हाल - चाल कैसा है बन्धु ,
यही काम क्यों कर सूझा ??
कहा प्रभु के कार्य मे ,
हो रहा यह जन्म सफल ।
श्रम नहीं यह सेवा है ,
प्रभु - भक्ति का सुंदर फल ।।
भवन नहीं यह मंदिर बनेगा ,
संत - भक्त जन आयेंगे ।
धन्य हुआ जीवन हमारा ,
महापुण्य फल पायेंगे ।।
राजा विचारे कार्य एक है ,
मन के भाव अलग ।
भावानुसार मिलता है ,
सबको अपना - अपना फल ।।
श्रम से थकान खिन्नता ,
सेवा से मन प्रफुल्लित ।
श्रम नहीं सेवा भली ,
सेवा से जीवन सुगन्धित ।।
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