कवयित्री- अवस्थी 'छाया'
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
शीर्षक- 'सुमन'
पुष्प, प्रसून ,कुसुम अरु फूल,लेकिन सुमन कहाँ है?
आकुल, व्याकुल तितली, भँवरे,पूछें सुमन कहाँ हैं?.......
दुर्लभ होते अब सुभाव अरु,दुर्भावों के मन हैं,
पुष्प गुच्छ से करके स्वागत, करते चैन खनन हैं।
गुलदस्तों में फूल हैं दुर्लभ,संपन्नता के सूचक.
वैभव के जालों में लिपटे, इक आखिरी कफन हैं।
कोमल पँखुरियों को थामें, विष से भरे कुमन हैं.......
खोज रही हूँ मैं भी आखिर, गुम जो,सुमन कहाँ हैं?
पुष्प चक्र अर्पित करते हैं, व्यापारिक वृत्ति से,
अर्पित करते गुलदस्तों में, स्वार्थ परक दृष्टि से।
ताजे फूलों की खुशबू में, चालें बहुत छुपी हैं,
बड़ी अचंभित और दुखी , जँजालें बहुत बिछी हैं।
भाँति-भाँति के रँग गँध सँग ,मुखरित कहाँ जो मन है?
दुर्भावों की 'छाया' में वो, खोया सुमन कहाँ है?
पुष्प, प्रसून,कुसुम अरु फूल.......लेकिन सुमन कहाँ है?
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