Thursday, August 13, 2020

कांकेर,छत्तीसगढ़ से कवि संतोष श्रीवास्तव'सम' जी की कविता- संघर्ष

नाम -संतोष श्रीवास्तव "सम"
जिला - कांकेर,छत्तीसगढ़
शीर्षक - संघर्ष 
    
             संघर्ष 
            ------------
मैंने संघर्ष को देखा है, 
बड़ा विकट होता है, 
तिल तिल करके जलना,  होता है और, 
ग्रीष्म की तपन के जैसा, 
तपना होता है। 

हवाओं की उल्टी दिशा, 
पग पग पर रोकती है, 
और झोंकती है, 
किसी दहकते अंगारे में।

बीच मझधार में, 
डूबती कश्ती का हाल, 
और पैर पटकना, 
तेज धार में, 
किनारे तक पहुँचने को।

जख्म सदा हरे भरे होते हैं, 
जो सदा उत्सुक होते है, 
किसी नमक के छिड़काव को सहने। 

संघर्ष की व्यथा, 
समूचे आलम को, 
अपने में लिपटाया सा, 
सदा बढ़ता जाता है, 
किसी लक्ष्य के साथ।

और, 
उल्टी हवाओं को,
चीरता हुआ सा, 
डुबते उतराते, 
लगा होता है, 
पाने कोई पुरस्कार। 

--- संतोष श्रीवास्तव "सम"
              कांकेर  

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