Saturday, August 29, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना- निंदा या सम्मान

नाम----गिरधारी लाल चौहान
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता भ्रान्तिमान अलंकार पर आधारित 
शीर्षक --निन्दा या सम्मान


व्याख्या ---कवि  द्वारा निन्दा या सम्मान से अपने को भ्रमित बताया गया है भ्रम की स्थिति का वर्णन किया गया है ।



              निन्दा या सम्मान

   मेरी निन्दा  कर रहा तू , या मेरा सम्मान ।
   तेरे शब्दों के कारण ,नहीं आ रहा  पहचान ।
  सुन रहा हूं कभी मुझे,  तू मित्र बताता  फिरता ।
 कभी  सुनता कहता , फिरता दुश्मन  के समान ।

तेरे दो दो पहचान से, कैसे अपना पहचान बनाऊं ।
दो किनारा खड़ा किया मुझे,किस ओर रह जाऊं ।
एक लक्षण तो जायेगा मेरा,एक रहेगा पहचान ।

मेरे मन को भ्रमित करने, में तेरा हाथ है ।
 मन कह रहा तू नागनाथ या सापनाथ है ।
तीसरा होगा बताकर करदे मुझ पर एहसान ।

तेरे मन के अमृत ,या जहर को निकाल ।
स्पष्ट कहते नहीं बन रहा, ये है मेरा सवाल ।
कैसे तुझे भला कहदूं,या बहुत बुरा इंसान ।

दो नावों पर पैर रखकर,चला नहीं जाता ।
अगर कोई रखता, किनारा ही नहीं पाता ।
मझधार में  ही उसका ,हो जाता अवसान ।

बच अपने दुर्गुणों से, सद्गुणों को सम्हाल ।
सदगुण ही काम आते,चमका इससे भाल ।
यही होते इस जीवन के,आन बान और शान ।

गिरधारी लाल चौहान

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