जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता भ्रान्तिमान अलंकार पर आधारित
शीर्षक --निन्दा या सम्मान
व्याख्या ---कवि द्वारा निन्दा या सम्मान से अपने को भ्रमित बताया गया है भ्रम की स्थिति का वर्णन किया गया है ।
निन्दा या सम्मान
मेरी निन्दा कर रहा तू , या मेरा सम्मान ।
तेरे शब्दों के कारण ,नहीं आ रहा पहचान ।
सुन रहा हूं कभी मुझे, तू मित्र बताता फिरता ।
कभी सुनता कहता , फिरता दुश्मन के समान ।
तेरे दो दो पहचान से, कैसे अपना पहचान बनाऊं ।
दो किनारा खड़ा किया मुझे,किस ओर रह जाऊं ।
एक लक्षण तो जायेगा मेरा,एक रहेगा पहचान ।
मेरे मन को भ्रमित करने, में तेरा हाथ है ।
मन कह रहा तू नागनाथ या सापनाथ है ।
तीसरा होगा बताकर करदे मुझ पर एहसान ।
तेरे मन के अमृत ,या जहर को निकाल ।
स्पष्ट कहते नहीं बन रहा, ये है मेरा सवाल ।
कैसे तुझे भला कहदूं,या बहुत बुरा इंसान ।
दो नावों पर पैर रखकर,चला नहीं जाता ।
अगर कोई रखता, किनारा ही नहीं पाता ।
मझधार में ही उसका ,हो जाता अवसान ।
बच अपने दुर्गुणों से, सद्गुणों को सम्हाल ।
सदगुण ही काम आते,चमका इससे भाल ।
यही होते इस जीवन के,आन बान और शान ।
गिरधारी लाल चौहान
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