ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -कविता
शीर्षक- निंदक(भ्रम)
*निंदक*
भ्रमित मन दूसरों को,
वही कह देते हैं।
जो मन में विचार आए,
उन्हें वही कह देते हैं।
भ्रम में कुछ भी कह दे,
वह वैसा नहीं होता है।
जैसा हम मान लिए हैं,
ऐसा नहीं होता है।
जिसे हम बैर समझते,
वह ऐसा नहीं होता है।
संसार में कोई बैर नहीं,
भ्रम में ऐसा लगता है।
भ्रमित हो जो निंदा करें,
निंदक वह कहलाते हैं।
गलतियों का ध्यान करा कर,
अच्छे मित्र कहलाते हैं।
जैसे दुहना की दही अरु,
टुकनी की कपास।
दोनों में कोई अंतर नहीं,
मन भ्रमित हो जाए।
भ्रम में भोर भुजंग,
देखें रस्सी समान।
ज्यों ज्यों उजाला होत,
रस्सी समझ में आय।
गर्मी में तील मिलाती धूप,
नीर, रेत एक समान।
एक द्रव ,एक ठोस,
समीप से आए ज्ञान।
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उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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