रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-छंद मुक्त कविता
विषय- जीवन की दोपहर
अलंकार-श्लेष वक्रोक्ति अलंकार
शीर्षक- जीना सीखा दूँ
अभी तो सूरज की किरणें
मेरी आँचल में खेल रही थी
अपने रंग में मुझे रंग रही थी
सुबह पक्षियों का कलरव
कानो में मीठा रस घोल रही थीं
आंखों में एक अनदेखा,अनछुआ
एक प्यारा सा सपना खेल रहा था
कि देखो जीवन की दोपहर आ गई
जो जीवन का एक नया रूप दिखा गई
जिसमें स्थिरता है ठहराव भी है
एक नई सोच,आनन्द के उत्सव भी हैं
आज मुस्कुरा लूं या जी लूं जिंदगी
ये वक्त थम जा ,ठहर जा जरा
अभी तुम्हे आगोश में भरना है बाकि
जी -भर के अभी जीना है बाकि
जीवन की सांझ आये उससे पहले
कुछ मुस्कुराहटें बाँट लूं
यूँ ही बीत जाए उससे पहले
जी लूं और जीना सीखा दूँ
जीवन की हर छोटी -बड़ी मुश्किलों
को एक भाव से पीना सीखा दूँ।
👌
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