जिला :- महासमुंद
विषय :- जीवन का दोपहर
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- श्लेष वक्रोक्ति अलंकार
शीर्षक :- कब हो जीवन का दोपहर
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जीवन के इस खेल में,
भाग दौड़ में थक जाता हूं अक्सर।
जाने कब मिले जरा सुस्ताने को,
जाने कब हो जीवन का दोपहर।
चलते चलते राहों में मैं,
गांव से चला, पहुंच गया शहर।
जाने कब मिलेगी मंजिल मुझे,
जाने कब हो जीवन का दोपहर।
देखे कई उतार चढ़ाव जीवन में,
मिला कहीं धूप, कहीं छांव का असर।
चल रहा हूं फिर भी मैं अविरल,
जाने कब हो जीवन का दोपहर।
लक्ष्य बसाए रखा हूं उर में,
मगर राह से भटकने का है डर।
कहीं थककर गिर ना जाऊं,
जाने कब हो जीवन का दोपहर।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन का दोपहर अर्थात् जीवन में एक मध्यम पड़ाव की कामना की है जहां वह इस भाग दौड़ में सुस्ता सके।
साथ ही कवि ने जीवन में धूप छांव अर्थात अच्छे व बुरे दिन का भी जिक्र किया है।
उपरोक्त पंक्तियों में काव्य अलंकरण के लिए श्र्लेष वक्रोक्ति अलंकार का प्रयोग किया है।
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