रायगढ़ छत्तीसगढ़
विषय-मित्रता ( असम अलंकार)
विधा-छंद मुक्त कविता
शीर्षक- तुझसा ना कोई
जीवन के दोराहे पे
खड़े मुसाफिर को
जो सही राह दिखा दे
जब डगमगाने लगे कदम
तो हाथ पकड़ चलना सीखा दे
जब खोने लगे अपना ही अस्तित्व
तो मुझसे मुझे मिला दे
जो पुष्प बनकर मेरी राहों
में बिछे कांटो को चुन लें।
ऐसा मित्र जो मित्र मंडल में नहीं
तुझसा कोई उपहार जीवन मे नहीं
जो रातों में मेरे साथ जागी
मेरे हँसने पे जो खिलखिलाई
और मेरे आँसू संग आँसू बहाई
जो मेरी बकबक-झकझक को भी
एक समान भाव से झेल गई।
ऐसा मित्र जो मित्र मंडल ने नहीं
तुझसा कोई उपहार जीवन मे नहीं
मित्रता भेदभाव नही समभाव है सीखाती
हर परिस्थिति में जो साथ है निभाती
खून के रिश्तों से परे ये जज़्बात का रिश्ता है
हर रिश्ते से खरा रिश्ता है जो अपनेपन से भरा है
मुझसा कोई रईस रईसओं में नही
तुझसा कोई पुष्प बगिया में नहीं
ऐसा मित्र जो मित्र मंडल में नहीं
तुझसा कोई उपहार जीवन में नहीं।
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