जिला :- महासमुंद
विषय :- रक्षाबंधन
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- अनुप्रास अलंकार।
शीर्षक :- प्रीत का पर्व
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मास सुहाने सावन की में,
पावन प्रीत का पर्व है प्यारा।
पीहर आ रही बहना प्यारी,
राह तके है राज दुलारा।
दो घरों से घिरी है बहना,
दो रिश्तों को जोड़ रही।
रक्षा का वादा भाई से लेकर,
डोर रेशम की जोड़ रही।
कोरे कोमल कलाई भाई की,
सजते सुंदर नेह की डोरी।
कहती बहना भाई से की,
करना रक्षा सदा ही मोरी।
ज्यों उमड़ते मेघराज है,
घुमड़ रहा है उर में प्यार।
बहना चाहती कच्चे धागे से,
जोड़े बचपन के नेह के तार।
सनै - सनै सुन्दर रिश्तों में,
बढ़ती प्रगाढ़ता प्रेम की।
दूर तलक तक चमक बिखेरे,
ज्यों गहने हो हेम की।
जग में कोई और ना दूजा,
पावन प्रीत का सुन्दर रिश्ता।
भाई बहनों में विश्वास जैसा,
कहीं और जग में ना मिलता।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने भाई बहन के प्रेम भरे त्यौहार को अपने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है।
साथ ही कुछ स्थानों पर वर्णों की आवृत्ति कर अनुप्रास अलंकार की छटा बिखेरने का भी प्रयास किया है।
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