स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"राखी का संदेश"(अनुप्रास अलंकार)
विधा- छंदमुक्त कविता
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अबकी राखी ना आ पाऊंगी
भैया भूल कर भी भूल न जाना
भेज रही हूं प्यार के धागे
कलाई पर जरूर सजा लेना।
भाई के उजले माथे पर
आज लगा न पाऊं टिका
बहन पराए देश बसी है
याद का दीपक जरूर जलाना ।
आज तुम तक पहुंच न सकी
जल्दी -जल्दी जड़ हो जाना
मैं न आ सकूँ तो तुम ही आना
भैया राखी की रीत निभाना ।
मालूम है मुझे मुख मुरझाएगा
वीर मेरेे तुम मायुष न होना
शाम ढलेंगी और दिन बीतेंगे
फिर राखी हम जरूर मिलेंगे।
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व्याख्या-: (ससुराल से नहीं आ पा रही बहन छोटे भाई को राखी भेज कर समझाते हुए )
(भैया भूल के भी भूल) में अनुप्रास है।
(जल्दी जल्दी जड़ हो जाना )में अनुप्रास है।
(मालूम है मुझे मुख मुरझाएगा)में अनुप्रास है।
Nice di
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