जिला -कोरबा छत्तीसगढ़
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार:- उपमा
शीर्षक--चाहत पार्थ बनने की
प्रस्तुत है कविता--
आज जन्माष्टमी का है पर्व निराला ।
जग को आनंद विभोर करने वाला ।
कहाँ से ऐसी शब्दावली लाऊं,
देवकीनन्दन के कैसे गुण गाऊँ ।
जो सृष्टि के कण -कण को बांधें,
कैसे उन्हें निज प्रेम पाश में बांधूं ।
उनके राजीवलोचन में
कैसे कृपा पात्र बनूं मैं
अपनी व्याकुलता कैसे बताऊँ,
कैसै उनके करकमलों का आशीष अपने सिर पर पाऊँ ।
अश्रु मेरे आँखों में है आने लगे,
जब वो कलम में समाने लगे ।
हे केशव ! कर्म करूँ पर फल ना चाहूँ!
मुझको भी इसका मर्म बता दो,
चलना चाहूँ राहों में तेरी,
मुझको भी तो पार्थ बना लो ।
मुझको भी तो पार्थ बना लो ।
गोमती सिंह, कोरबा छत्तीसगढ़
ब्याख्या--रचनाकार श्री कृष्ण जी के जन्माष्टमी पर्व पर आनंद विभोर होते हुए खुद को अर्जुन जैसे भक्त बनाने की कामना कर रही है ।
गोमती सिंह
कोरबा छत्तीसगढ़
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