कवयित्री: डॉ बी निर्मला,' राजी '
जिला: मैसूर,
राज्य: कर्नाटक,
शीर्षक: वर्षा
वर्षा
गर्मी से थे जीव जंतु परेशान,
वर्षा का था सबको इंतजार,
देखो देखो नभ में मची कुछ हलचल,
पल में छा गए काले काले बादल।
एकाएक मौसम भी बदल भी गया,
वातावरण सुहाना सा हो गया
ठंडी ठंडी हवा भी बहने लगी,
सबके मन को राहत मिलने लगी,
देखो वर्षा ऋतु आई,नजारे बदले,
घुमड़ घुमड़कर,झूम झूमकर बादल आए,
रिमझिम रिमझिम पानी बरसे
सबका मन भीगने को तरसे।
वर्षा की बूंदों से लहलहाए सूखे पत्ते,
माटी में गिरे पेड़ भी हुए उठ खड़े।
सूखी मिट्टी,भूमि भी पानी में भीगी,
किसान भी तैयार करने अपनी खेती
नदी,तालाब,सब लगे धीरे धीरे भरने,
मेरी बारी आई कह मेंढक लगे टर्राने।
मोर भी अपने पंख खोल,लगे नाचने,
सुंदर,रंग बिरंगे छाते दिखाई देने लगे।
माटी की सुगन्ध लगे भीनी भीनी,
चाहें सब, अब चाय मीठी मीठी,
साथ में हो जाए गर्म गर्म पकौड़े,
खुशबू पाकर सब आए दौड़े दौड़े।
अरे देखो,बच्चे भी बाहर को दौड़े,
बीन बीनकर मजे ले,खा रहे ओले,
चारों ओर मनभावन हरितिमा छाई,
वर्षा अाई,सबके मन में उमंग भर लाई।
रचियता :
डॉ.बी.निर्मला,
मैसूर।
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