Monday, August 3, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- रक्षाबंधन

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " रक्षाबंधन का त्यौहार "
     विधा - छंदमुक्त कविता 
अलंकार - अनुप्रास अलंकार 
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रक्षक बन रक्षा करने का यह त्यौहार है। 
राखी बंधाकर जीवन भर, 
साथ निभाने का त्यौहार है।
रक्षाबंधन का यह पावन पर्व, 
भाई-बहनों का प्यार है।।1।। 

बिताये बचपन बहना के साथ, 
बहुत ही खुशनुमा था।
मेरी फ़रमाइश को पूरा करने वाला, 
भाई ही मेरा रहनुमा था। 
लड़ते झगड़ते प्यार भी करते,
हर मुसीबत में मेरे साथ रहते, 
लुका छिपी में,बंद आँखों से जो
कुछ पल के  लिए गुमा था।।2।।

यादें बहुत याद आती है, 
यादों में ही याद, यादगार हो जाती है। 
चॉकलेट का छीनना तेरा, 
ओय! हीरो बोलना तेरा, 
यादों की बारात सज आती है।।3।। 

भाई मेरा हमेशा खुश रहे, 
दीर्घायु की ईश्वर से कामना है।
वादा है बहन आज मेरा भी तुझसे,
तेरे दामन तक पहुँचने से पहले,
हर बुराई का मेरे से सामना है।। 4।।

बहना सबकी एक सी, 
फिर भी भेदभाव की बात क्यों आती है। 
एक भाई के द्वारा ही, 
दूसरी भाई के बहनों को, 
गंदी नजरों से क्यों देखी जाती है।।5।।

बहन की अहमियत पूछो उनसे, 
जिनकी न कोई बहन है। 
बाग खिला बहारों की, बगल में, 
बहन बिना बेकार सारा चमन है।।6।।

एक राखी उस भाई के कलाई पर भी, 
जो शरहद पर तैनात जवान है। 
रेशम का धागा उनके हाथों में भी, 
जो मेहनतकश मजदूर किसान है।।7।।

कलाई उनकी भी न सुनी जाये,
डॉक्टर, सेवारत जो दिन रात हैं। 
कोरोना का कवच बनकर, 
कर रहे न अपनों से मुलाकात हैं।।8।।

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3 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना है भाई संत

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  2. बहुत अच्छा मामा जी👌👌👌

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