स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- छंदमुक्त कविता
शीर्षक -"अधूरी ख्वाहिशें"
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ख्वाहिशें अधूरी न हों कभी
गर जग रूठे तो रूठता रहे
पूरी न हो कोई तमन्ना कभी
सम्हाले सम्हलना जरूरी न रहे
मेरी इल्तज़ा है उस ख़ुदा से
गर दिया है शरीरे खाख तो
दिलो दिमाग न दिया होता
गर जगीं ख्वाहिशें कभी तो
उन्हें पूरा जरूर किया होता
तुच्छ ख्वाहिशें पूरी न हो सकीं
मैंने रब को रूठते देखा है
रब के बनाये इस बड़े जहाँ में
ख्वाहिशों को टूटते भी देखा है
आंखों को अश्कों से तर देखा है
दिल को घुटनों के बल देखा है
बेमन से जीते तन देखा है
पुष्पा पूछती है परवर दिगार
क्यूँ कर रहा यूँ अत्याचार
मैं तो कबसे बंद कर ली आंखें
ख्वाहिशें फिर भी सांसें क्यूँ ले रहा है।
Very hearttouching
ReplyDeleteVery nice 👏👏👌👌👌
ReplyDeleteabhutpoorv rachna
ReplyDeleteBahut badhiya
ReplyDeleteVery nice 👌👌👌
ReplyDeleteVery nice 👌👌👌
ReplyDeleteVery nice 👌👌👌👌
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