जिला-महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"ख़्वाहिशें अधूरी"
विधा-"अश़आर"
दिनांक-18/08/2020
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नज़रों ने बख़ूबी किया अपना काम,
बचते रहे ख़ुद नसीब हुआ बदनाम।
ख्वाहिशों को जलते नाउम्मीदी में,
सिसकते हर पल देखा किया हमनें।।
वह शीशा नहीं पत्थर है साहिब,
साबित करने को वफादारी वाज़िब।
सिर पटककर लहूलुहान ख़ुद ही,
अपना तन और अंतर्मन किया हमनें।।
जहाँ थे वहीं फिर से खुद को पाया,
मग़रूराना इल्ज़ामात सिर पे आया।
अपने हिस्से में आए आँसुओं को,
ख़ामोशी से पीना सीख लिया हमनें।।
तड़पती तमन्नाएँ हैं ख़्वाहिशें अधूरी,
पास रहकर भी रही मीलों की दूरी।
मन में मिलन की आस लिए हुए,
उम्मीदों का दामन थाम लिया हमनें।।
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