जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---छंद मुक्त कविता(पुनरुक्तावदाभास अलंकार पर आधारित)
शीर्षक ---सब आन बसो मन में
व्याख्या ---कवि के द्वारा जिनका वर्णन किया गया है उनकी इच्छा है कि सभी उनके मन में आकर बसें एवं उनका कल्याण करें । मानव का कल्याण वेद पुराण में वर्णित देवताओं द्वारा ही संभव है इसलिए शीर्षक का नाम भी सब आन बसो मन में उन्होंने रखा है ।
************************************************ सब आन बसो मन में
स्वामी, मालिक लड़ पड़े ,लेकर घर परिवार ।
ऐसे लड़ने वालों का, होता जय जय कार ।
सुमन पुष्प लेआई ,थी बहुत उसकी दरकार ।
मिलते लाने वाले गिने चुने ,कहने वाले हजार ।
समीर, हवा को देखो ,चल रही है आज अधिक ।
मुझको ऐसे लग रहा है ,जैसे घुम रहा वधिक ।
हरि, वानर दोनों ही लड़े ,तुलसी ने यह गाई ।
भाई -भाई आपस में लड़े ,उसकी भी है चौपाई ।
धन दौलत माल खजाना ,नहीं ईश्वर के दरबार ।
जो जाते वो लोग पाते ,उससे बढ़कर भण्डार ।
रोग, बीमारी योग से ,आता कभी न आसपास ।
इसमें दोनों ही आवश्यक ,विश्वास और अभ्यास ।
राम ,रघुवीर ,सीतापति ,संत जानते कई -कई नाम ।
हम तो एक ही रटते सदा ,सिर्फ दो अक्षर के राम ।
शिव, शंकर ,भोलेनाथ, आपके शरण -शरण मैं आज ।
कहूं मैंआप ही सम्हारिए ,अब जो भी होगा मेरा काज ।
धरती ,पृथ्वी ,वसुंधरा, सारे जग की पालन हारिणी ।
करु नमन निशदिन तुझे, प्रत्यक्ष रुप अवतारिणी ।
मोहन, गोपाल, घनश्याम ,श्याम रट- रट सुर पुकारे ।
राधा रटे मेरे मुरली वाले ,तू आजा यमुना किनारे ।
गिरधारी लाल चौहान
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