संबलपुर, जिला-कांकेर
शीर्षक-सुख-दुःख से भिन्न अनन्त सुख
(पुनरुक्तवदाभ्यास अलंकार का प्रयोग)
*सुख-दुःख से भिन्न अनन्त सुख*
जीवन है तो सुख-दुःख है
इसे समझिए आप,
सुख में ना हर्षित हो
दुःख में ना हो विषाद।
मानव भंवर में
भटक रहा ज्यौं,
अलि के कली में ज्यौं
फंसा होने की बात।
सुख-दुख
एक दूसरे के आश्रित,
कभी सुख हो जीवन में
कभी दुख से हो शापित।
सुख में ना इतराएं कभी
ये चपला की आस,
दुख में कनक सुवर्ण सा बने
मन में हो विश्वास।
सुख सपन सा नयन
खुलते होता एहसास,
दुःख में ईश मिले
अनन्त सुखों के साथ।
सुख-दुख से भिन्न
अनन्त सुख महान,
जग में दोनों का
तटस्थ हो करें सदा मान।
जग में आतप-बरखा
सम मानों,
ईश्वर का आशीष
हो सदा पास।
नाथ अनाथों के बनों
जिसके ना हो तात की आस।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ .ग.)
*व्याख्या*-प्रस्तुत कविता में सुख-दुख से जीवन का अनन्य संबंध है।दोनों एक दूसरे के पूरक है।दोनों से जो परे होता है उसे ही अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है।
पुनरुक्तवदाभास अलंकार-
भंवर- मंझधार,भंवरा
कनक -सोना
सुवर्ण-सोना,सुन्दर वर्ण
तात-पिता,ईश्वर
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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