Friday, August 7, 2020

दुर्ग से अनुरमा शुक्ला की रचना- मिलती है अनंत सुख जब

रचनाकार - अनुरमा शुक्ला
स्थान -दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्तक ,पुनरुक्तवदाभास अलंकार का प्रयोग

शीर्षक- *मिलती है अनंत सुख जब*

कुछ बातें हो जाती हैं खास,
होते मन के समीप जज़्बात,
परे होते हैं जो निज स्वार्थ से,
पर सुख में परम सुख का एहसास  ।

महसूस होती है अनंत अनुभूति,
ममता की,दया की,लगाव की,
जब मासूम मुस्कान मुस्कुराती है,
अनाथ सुमन पुष्प हो जाती है।

निराश्रित को मिलती है जब,
मजबूत हाथों की स्नेहिल छूअन,
यह आसरा ही जीवन-पर्यन्त ,
सुखद पड़ाव दे जाती है ।

किसी फुटपाथ की धूल  सँवरकर,
जब महलों की मोती बन जाती है,
जीवन के सुख-दुख से अलग यह,
अनंत सुख मन को गुदगुदाती है।।

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पुनरुक्तवदाभास अलंकार
 बातें-घटना,पर-दूसरे,जाती है-रहना,छुअन-सहारा,मुस्कान-नाम,सुमन-नाम,पुष्प-खुश होना,
धूल-सामान्य, मोती- विशेष,विशिष्ट ।

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