नाम - देवव्रत कर शर्मा
पता - आवास पारा जैसा कर्रा पोस्ट जैसा कर्रा चारामा जिला कांकेर छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक - मैं चिटकी
मै चिटकी नीड़ से भटकी ,
तरू शाख से नीचे उतरी।
भान नहीं हुआ ऊंचाई का,
आनंद लेती रही गहराई का।
चुगती रही दाना फुदकती रही,
अनजाने उपवन मे फिरती रही ।
दिन ढल गया नीड़ याद आया,
अंधेरे में कुछ समझ नहीं आया ।
तरु तरु शाख शाख उड़ती रही,
जहाँ से उड़ी वो शाख ढूंढती रही।
थक कर निढाल हो रही मगर,
नाप चुकी थी मैंने पुरा शहर।
एक नया आशियां की तलाश,
मिला जीवन को एक प्रकाश ।
भोर के इन्तजार में बैठ गयी,
मैं चिटकी यहीं पर भटक गयी ।
थकान से चूर आंख लग गयी,
खुली जब आंख धूप चढ़ गयी।
हालात पर अपने रोना आया ,
जब खुद को पिंजरे में पाया।
कैद मे जिन्दगी खो गया था,
कटे पंख में जीना पड़ता था।
तभी एक और चिटका आया,
तब जीवन हमे भी जीने भाया।
सुबह से शाम तक पिंजरे में ही,
घुम घुम कर चहकते रहते सही ।
वक्त ने साथ दिया तो मुस्कुराएंगे,
उन्मुक्त गगन में पर फैलाएंगे ।
यही भावना ले कर जी रहे थे ,
कैद जिन्दगी का दिन गिन रहे थे ।
कुछ दिन बाद पल ऐसा आया ,
मुक्त होने का अवसर आया ।
गलती से पिंजरा खुला रह गया,
हमें निकलने का मौका मिल गया।
चिटका चिटकी ने पंख फैलाए,
छोड़ पिंजरा हवा में गोते लगाए।
बरसों बाद आज आजाद हुए,
पंख पसारे आसमान को छुए।
भूल गए हैं पुराने अपने घोसले,
बाकी है अभी उम्मीद भरे हौसले।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा,
बंध गई बीच प्यार की रेखा ।
हम एक नया आशियां बनाएँगे,
चलो अपना एक संसार बसाएँगे।
कभी भी अपना नीड़ नहीं छोडेंगे,
आने वाली पीढ़ी को सीखाएंगे।
चलो एक बार फिर से घुम आएं,
उन्मुक्त गगन की पंछी बन जाएँ।
जीवन के लिए सपने लेकर चले,
चिटका चिटकी अब साथ भले ।
शाख से बिछड़े दो एक हो गये,
फैले आसमान में ओझल हो गये।
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