जिला :- महासमुंद
विषय :- दर्शनशास्त्र
विधा :- दोहा छंद
शीर्षक :- जीवन दर्शन के दोहे।
अलंकार :- दीपक अलंकार
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१.
दर्शन दर्पण एक सा, देखे जग निज रूप।
अच्छे को अच्छा लगे, बुरे को यह कुरूप।।
२.
परम सत्य संसार का, जन्म मृत्यु को जान।
नश्वर काया पर करे, मानव क्यों अभिमान।।
३.
चांद सूर्य सा जग में, है ईश्वर भी एक।
या मस्जिद सजदा करें, या मठ मस्तक टेक।।
४.
जीवन क्रीड़ा एक सा, बाधा मिले अनेक।
मोक्ष मार्ग उसको मिले, लक्ष्य रखे जो एक।।
५.
भवसागर तरता वहीं, करे मोह का त्याग।
दुनिया दारी छोड़ जो, चुने जगत बैराग।।
६.
जीवन पतंगा इक से, चार दिवस सौगात।
कुछ पल का पाहुन हुआ, जग में नवल प्रभात।।
७.
मनवा अविरल वेग से, नद सा बहता रोज।
निर्झर नित बहता रहे, भवसागर की खोज।।
८.
मौसम सा जीवन हुआ, होवत नित बदलाव।
गिरगिट सा रंग बदले, जैसे होत छलाव।।
९.
नीड़, नेह व ईश करें, जग में नर की त्राण।
ज्यों जग के संजीवनी, देते मृत को प्राण।।
१०.
संत सुमन संसार में, रखते इक से भाव।
उर में सुगंध जो रखे, मुस्काता मनुभाव।।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन दर्शन के कुछ सत्य को अपने दोहे में छंदबद्ध करने का प्रयास किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने दीपक अलंकार का प्रयोग किया है।
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