स्थान-दुर्ग (छ.ग.)
विधा-मुक्तक (यमक अलंकार)
शीर्षक- *गुमराह*
कर में धरे कमंडल वह चला,
वेश धरा साधू का प्रियतम् ,
छोड़ चला वह घर-द्वार,
होकर इस धरा से गुमराह।
कर रही करबद्ध निवेदन,
प्रेम-लगन में प्रेयसी उसकी,
जल रहा मन, का से कहे,
जल से यह जलन कैसे बुझे।
बिन रखे थे मोती सपनों के,
तुझ बिन कंकड़ जैसे हैं चुभते,
वो अनसूनी बात कर दिये,
सूनी कर उसकी कर चले गये।
मन हुआ मरूस्थल सा सूखा,
जल रहा धू-धूकर कानन जैसा,
वह अभागी दर-दर भटके ,
बूंद भर जल को अब तरसे ।
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यमक अलंकार-
धरा -धारण,धरती,पकड़
बिन -बगैर,चुनना
कर-हाथ,करना
जल-जलन,पानी,आग लगना
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