जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " गुमराह "
विधा - छंदमुक्त कविता
अलंकार - यमक अलंकार
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अब्ज सी तेरी सूरत पे,
गुमराह मैं हो गया हूँ।
सादगी तेरी अब्ज सी,
तुझमें ही सराबोर हो गया हूँ।।1।।
अधर तेरी बहुत नशीली,
रसपान में उसके खो गया हूँ।
काली जुल्फें काली घटाएं,
मानो अधर में ही सो गया हूँ।।2।।
आँखें तेरी झील सी गहरी,
गहराई में जिसकी डूब गया हूँ।
आँख सी वस्त्र तेरी रंग बिरंगी,
गुमराह की राह में खुद गया हूँ।।3।।
तेरे प्यार के चक्कर में,
मैं कितना लापरवाह हो गया हूँ।
जिस लक्ष्य पे में निकला था,
उस मंजिल से बेपरवाह हो गया हूँ।।4।।
छोड़ गयी चपला तू साथ मेरा,
चपला से भी दूर मैं हो गया हूँ।
फ़रमाइश तेरी जुटाने में,
अपनों से भी झूठ मैं बोल गया हूँ।।5।।
लाठी था मैं मेरे बूढ़े माँ बाप का,
सपने चूर मैं उनके कर गया हूँ।
अपने पथ से गुमराह होकर,
मोह माया में जकड़ गया हूँ।।6।।
गंभीर समस्या का हल मैं कैसे निकालूँ,
जमीन से दूर तो मैं हो गया हूँ।
किसान का बेटा आज मैं,
हल चलाना भी तो भूल गया हूँ।।7।।
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यमक अलंकार का प्रयोग :-
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अब्ज-- 1.चंद्रमा 2. कमल
अधर-- 1.होठ 2. अंतरिक्ष
आँख-- 1. नेत्र 2. मोरपंख
चपला-- 1. चंचल स्त्री 2. धन
हल-- 1. समाधान 2.खेत जोतने का यंत्र।
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बहुत बढ़िया भाई
ReplyDeleteWah kya khub
ReplyDeleteWah kya khub
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