स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"गुमराह"(यमक अलंकार)
विधा- छंदमुक्त कविता
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लोगों का दस्तूर
बिन सोंचे बिन जाने
चलते रहे नित दूर
कभी हो जाते फूर
तब पग हो जाते
लक्ष्य से अक्सर दूर
गुमराह हो जाना
गुमराह कर देना
लोग हैं बड़े निष्ठुर
गलती कर जाओ
कर जोड़ सर नवाना
अरे ! कैसा शर्माना
भूल जो अपनी माना
जग उसे पग पहना
देगा इतना सम्मान
तेरी बनेगी पहचान
किसी को न गुमराहना
ये हरकत है बचकाना
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यमक अलंकार-: कर-हाथ,करना
पग-पैर, सर पे बंधा फेटा (पगड़ी, इज्जत)
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