Saturday, August 8, 2020

रायपुर से एच-एस-अरमो की रचना- जीवन लीला

रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
निवास--बैरन-बाज़ार,रायपुर ।
जिला--रायपुर ,छत्तीसगढ़     ।
विधा-छंद-मुक्त,कविता   ।
शीर्षक-- "" जीवन-लीला ""    ।
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  **○•••《जीवन-लीला 》•••○**
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जीवन ,धूप-छाँव बन गई है,
जिसमें,कभी तेज चलती नाव है,
तो कभी-कभी,धीमी चलती नाव है ।

भोर बना , बचपने का खैवया,
जवानी हो गई, दोपहरिया,
शाम हुई ,बुढ़ापे की लठिया,
और वानप्रस्थ ,मरण है रतिया ।

जीवन में प्यार प्यार से ही मिले,
प्यार प्यासा बनकर ढले,
प्रेम प्यार से,होती बरबाद जवानी,
प्यार अफसाना से,आबाद जवानी ।

जी, वन जब बन जाते,
विचरती जहाँ,आशायें-अभिलाषायें,
जहाँ हिंसक,पशु से,बनते रिश्ते-नाते,
कभी,जान-माल के,लोमड़ी हो जाते।

पूत-कपूत तो क्या धन-संचय,
नारी-नार बन जाती,जब जीवन में,
जब बसती-बहती,गंगा बन ह्रदय में,
इक नारी,जब बन जाये नागिन रूप में,
डस लेती और जहर उगले जीवन में ।

फकीर फकीरा बन जब बन जाता है,
भीख-भिखारन बन लेवे व मांगती है,
फकीर सा,जीवन जीता रहता है,
वही जीवन में,सुख-चैन सदा पाता है ।

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व्याख्या:-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि मानव जीवन में कई बातें प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से घटित होती है ।
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